गुरु अंगद देव जी के पवित्र उपदेश
गुरमुखी लिपि के मानकीकरणकर्ता एवं सिख संस्थाओं के संवर्धक
गुरु अंगद देव जी के मुख्य उपदेश
गुरु अंगद देव जी (1504 - 1552) ने गुरमुखी लिपि को सरल व सुंदर रूप दिया, मल्ल अखाड़ों की स्थापना की और लंगर परंपरा को सुदृढ़ किया।
मुख्य ऐतिहासिक योगदान
गुरमुखी लिपि (Gurmukhi Script)
मातृभाषा का सम्मान
गुरमुखी वर्णमाला को व्यवस्थित किया ताकि सामान्य जन भी सरलता से वाणी पढ़ सकें।
मल्ल अखाड़ा (Physical Fitness)
शारीरिक एवं मानसिक स्वास्थ्य
सिखों के लिए अखाड़ों और खेलों की शुरुआत की, जिससे एक स्वस्थ समाज का निर्माण हुआ।
माता खीवी जी का लंगर
सेवा एवं समानता
माता खीवी जी की देखरेख में खीर रूपी अमूल्य प्रसाद वितरित किया गया और पंगत की परंपरा मजबूत हुई।
मुख्य आध्यात्मिक सिद्धांत
गुरु की आज्ञा का पालन
गुरु के हुकुम और रज़ा में रहना ही सच्चे सिख का परम धर्म है।
अहंकार का त्याग
नम्रता और समभाव से ईश्वर की भक्ति में लीन रहना।
शिक्षा का प्रसार
बच्चों के लिए पाठशालाएं शुरू कीं और साक्षरता को बढ़ावा दिया।
63 श्लोक (SGGS)
श्री गुरु ग्रंथ साहिब जी में दर्ज 63 श्लोक वैराग्य और अनन्य भक्ति का मार्ग दिखाते हैं।